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जानिए महाशिवरात्रि व्रत, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि एवं शिवरात्रि के बारें में सभी आवश्यक तथ्य विस्तार से

– पंडित दयानन्द शास्त्री,
(ज्योतिष-वास्तु सलाहकार)
भारत में हिन्दुओं द्वारा महा शिवरात्रि का एक प्रमुख त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है। यह भगवान शिव का प्रमुख पर्व है। फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माना जाता है कि सृष्टि का प्रारंभ इसी दिन से हुआ था।
प्रचलित पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सृष्टि का आरम्भ अग्निलिङ्ग ( जो महादेव का विशालकाय स्वरूप है ) के उदय से हुआ था। अधिक तर लोग यह मान्यता रखते है कि इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवि पार्वति के साथ हुआ था। साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
प्रिय पाठकों/मित्रों,  हम सभी जानते हैं कि मासिक शिवरात्रि का व्रत प्रत्येक महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को किया जाता है मगर फाल्गुन मास को जो चतुर्दशी पड़ती है, उसकी अर्द्धरात्रि को ‘महाशिवरात्रि’ कहा जाता है। महाशिवरात्रि पर व्रत और जागरण करने का विधान है। उत्तरार्ध और कामिक के मतानुसार सूर्य के अस्त समय यदि चतुर्दशी हो, तो उस रात को ‘शिवरात्रि’ कहा जाता है। यह अत्यन्त फलदायक एवं शुभ होती है। आधी रात से पूर्व और आधी रात के उपरांत अगर चतुर्दशी युक्त न हो, तो व्रत धारण नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसे समय में व्रत करने से आयु और ऐश्वर्य की हानि होती है। माधव मत से ‘ईशान संहिता’ में वर्णित है कि जिस तिथि में आधी रात को चतुर्दशी की प्राप्ति होती है, उसी तिथि में मेरी प्रसन्नता से मनुष्य अपनी कामनाओं के लिए व्रत करें।
शिव यानि कल्याणकारी, शिव यानि बाबा भोलेनाथ, शिव यानि शिवशंकर, शिवशम्भू, शिवजी, नीलकंठ, रूद्र आदि। हिंदू देवी-देवताओं में भगवान शिव शंकर सबसे लोकप्रिय देवता हैं, वे देवों के देव महादेव हैं तो असुरों के राजा भी उनके उपासक रहे। आज भी दुनिया भर में हिंदू धर्म के मानने वालों के लिये भगवान शिव पूज्य हैं।
इनकी लोकप्रियता का कारण है इनकी सरलता। इनकी पूजा आराधना की विधि बहुत सरल मानी जाती है। माना जाता है कि शिव को यदि सच्चे मन से याद कर लिया जाये तो शिव प्रसन्न हो जाते हैं। उनकी पूजा में भी ज्यादा ताम-झाम की जरुरत नहीं होती। ये केवल जलाभिषेक, बिल्वपत्रों को चढ़ाने और रात्रि भर इनका जागरण करने मात्र से मेहरबान हो जाते हैं।
वैसे तो हर सप्ताह सोमवार का दिन भगवान शिव की आराधना का दिन माना जाता है। हर महीने में मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है लेकिन साल में शिवरात्रि का मुख्य पर्व जिसे व्यापक रुप से देश भर में मनाया जाता है दो बार आता है। एक फाल्गुन के महीने में तो दूसरा श्रावण मास में। फाल्गुन के महीने की शिवरात्रि को तो महाशिवरात्रि कहा जाता है। इसे फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। महाशिवरात्रि के अवसर पर श्रद्धालु कावड़ के जरिये गंगाजल भी लेकर आते हैं जिससे भगवान शिव को स्नान करवाया जाता हैं।
आइये जाने और समझें महा शिवरात्रि के बारे में — महाशिवरात्रि 2018
13 फरवरी—
निशिथ काल पूजा- 24:09 से 25:01
पारण का समय- 07:04 से 15:20 (14 फरवरी)
चतुर्दशी तिथि आरंभ- 22:34 (13 फरवरी)
चतुर्दशी तिथि समाप्त- 00:46 (15 फरवरी)
13 फरवरी 2018 (मंगलवार) को श्री महाशिवरात्रि व्रत, मासिक शिवरात्रि व्रत, भौम प्रदोष व्रत का आगमन होगा। यह उत्तरी भारत में विशेषत: दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल, पंजाब, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गोवा, केरला, राजस्थान, तमिलनाडु, हरिद्वार, सहारनपुर, आगरा, मथुरा, उज्जैन, मेरठ आदि में 13 फरवरी को और पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, आसाम, म.प्र. लखनऊ, वाराणसी, इलाहाबाद, कानपुर आदि में 14 फरवरी को मनाया जाएगा।
वर्ष 2018 में चतुर्दशी तिथि 2 दिन 13-14 फरवरी को पड़ रही है। महाशिवरात्रि के पूजन का शुभ समय 13 फरवरी को आधी रात से शुरू हो जाएगा।
जिसका विश्राम 14 फरवरी को प्रात: 7:30 बजे से लेकर दोपहर 03:20 तक होगा। महाशिवरात्रि पर रात्रि में चार बार शिव पूजन का विधान है। ब्रह्म मुहूर्त में स्नान के बाद व्रत पारण होता है। पूजा समाप्त करके अगली सुबह स्नान के पश्चात् व्रत का पारण किया जाता है।
जानिए कैसे करें इस महाशिवरात्रि पर व्रत पूजन विधि —
महाशिवरात्रि व्रत का पूजन भी अन्य व्रत के भांति प्रातःकाल किया जाता है। जिसके लिए सूरज उगने से पूर्व नहा लेना चाहिए। उसके बाद अपने घर के पास मौजूद किसी शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव का जलाभिषेक और दुग्धाभिषेक करना चाहिए। इसके बाद शिवलिंग पर भांग, धतुरा, बेलपत्र, आख, आदि अर्पित करना चाहिए। माना जाता है अन्य फलों की तुलना में शिव जी को जंगली फल व् पत्तियां अधिक प्रिय है। इसके बाद धुप-दीप जलाकर शिव जी की आरती गानी चाहिए और प्रणाम करना चाहिए।
व्रत रखने वाले व्यक्ति इस दिन कुछ नहीं खाते। वैसे अगर आप चाहे तो फलों के रस या फलों का सेवन कर सकते है। लेकिन भोजन या अन्न का सेवन नहीं करना चाहिए। हालांकि कुछ भक्त व्रत के दौरान रात्रि पूजन से पूर्व सायंकाल के समय एक बार भोजन कर लेते है। तो इस वर्ष आप भी भोले बाबा का व्रत करके उन्हें प्रसन्न करें और उनसे अच्छे जीवनसाथी का आशीर्वाद लें।
भोलेनाथ की कृपा पाने के लिए पूजा करते समय ऊँ नमः शिवाय…मंत्र का जाप करते हुए ऊपर बताई गई सभी वस्तु भोलेबाबा को अर्पित करें|  महाशिवरात्रि पर मां पार्वती और शिव जी की पूजा एक साथ करने का भी बहुत महत्व है | महाशिवरात्रि पर मंदिरों में विशेष रूप से शिवलिंग की पूजा की जाती है | आप लोगों की जानकारी के लिए बता दें कि शिवलिंग पर अर्पित किए गए जल को कभी भी पैर से नहीं लांघना चाहिए |
महाशिवरात्रि पूजा में बिल्वपत्र, धतूरा, भांग, बेर, आम्र मंजरी, जौ की बालें, मंदार पुष्प, गाय का कच्चा दूध, ईख का रस, दही, शुद्ध देशी घी, शहद, गंगा जल शिव का अत्यधिक प्रिय हैं | भगवान शिव की आराधना में इन्हीं वस्तुओं का प्रयोग करें|
महाशिवरात्रि भगवान शिव के सम्मान में सालाना मनाया जाने वाला हिंदू त्यौहार है। इस दिन शिव का देवी पार्वती से विवाह किया गया था। महाशिवरात्रि त्योहार, जिसे ‘शिवरात्रि’ या ‘शिव की महान रात’ के रूप में भी लोकप्रिय माना जाता है। शिव और शक्ति के अभिसरण को दर्शाता है अमावस्या-एंट महीने की गणना के अनुसार हिंदू कैलेंडर माह मेघ के कृष्ण पक्ष चतुर्दशी पर महा शिवरात्रि मनाया जाता है। पूर्णिमा-एंटी महीने की गणना के अनुसार, दिन है कृष्ण पक्ष हिंदू कैलेंडर माह फल्गुना का चतुर्दशी जो कि ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार फरवरी या मार्च में पड़ता है। वर्ष में बारह शिवरात्रियों में से, महाशिवरात्री सबसे पवित्र हैं।
शिव यानि कल्याणकारी, शिव यानि बाबा भोलेनाथ, शिव यानि शिवशंकर, शिवशम्भू, शिवजी, नीलकंठ, रूद्र आदि। हिंदू देवी-देवताओं में भगवान शिव शंकर सबसे लोकप्रिय देवता हैं, वे देवों के देव महादेव हैं तो असुरों के राजा भी उनके उपासक रहे। आज भी दुनिया भर में हिंदू धर्म के मानने वालों के लिए भगवान शिव पूज्य हैं। इनकी लोकप्रियता का कारण है इनकी सरलता। इनकी पूजा आराधना की विधि बहुत सरल मानी जाती है। माना जाता है कि शिव को यदि सच्चे मन से याद कर लिया जाए तो शिव प्रसन्न हो जाते हैं। उनकी पूजा में भी ज्यादा ताम-झाम की जरुरत नहीं होती। ये केवल जलाभिषेक, बेलपत्रों को चढ़ाने और रात्रि भर इनका जागरण करने मात्र से मेहरबान हो जाते हैं।
वैसे तो हर सप्ताह सोमवार का दिन भगवान शिव की आराधना का दिन माना जाता है। हर महीने में मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है लेकिन साल में शिवरात्रि का मुख्य पर्व जिसे व्यापक रुप से देश भर में मनाया जाता है दो बार आता है। एक फाल्गुन के महीने में तो दूसरा श्रावण मास में। फाल्गुन के महीने की शिवरात्रि को तो महाशिवरात्रि कहा जाता है। इसे फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। महाशिवरात्रि के अवसर पर श्रद्धालु कावड़ के जरिए गंगाजल भी लेकर आते हैं जिससे भगवान शिव को स्नान करवाया जाता हैं।
जानिए कैसे मनाई जाती है शिवरात्रि—
शिवरात्रि का पर्व बड़े ही धूम धाम और हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन सभी महिलाएं प्रातः काल जागकर स्नान आदि करके भगवान शिव के मंदिर जाती है। वहां शिवलिंग का जलाभिषेक कर दुग्धाभिषेक करती है। इसके बाद वे शिव जी को फूल आदि अर्पित कर उन्हें टीका लगाती है। तत्पश्चात वे उन्हें बेलपत्र, भांग, धतूरा, आख आदि फल-फूल चढाती है। माना जाता है सामान्य फलों और मिठाइयों की तुलना में शिव जी ये जंगली फल अधिक पसंद आते है।
इस दिन शिवलिंग पर धतूरा और बेलपत्र चढ़ाने का खास महत्व होता है। इसके बाद वे उन्हें किसी मीठी चीज से भोग लगाती है। भोग लगाने के पश्चात् धुप दिप आदि जलाकर उनकी पूजा अर्चना करती है और शिव जी की आरती जाती है | इस दिन उपवास रखने का बेहद ख़ास महत्व होता है। माना जाता है जो कन्या पुरे श्रद्धा और विश्वास के साथ शिवरात्रि का उपवास रखती है उसे मनचाहा वर प्राप्त होता है।
इसीलिए कुंवारी(अविवाहित कन्यायें )लड़कियां और सुहागिन महिलाएं इस पुरे दिन उपवास रखती है और अगले दिन पारण समय में अपना उपवास खोलती है। इस उपवास में आप पुरे दिन भर पानी पी सकती है, फल खा सकती है व्रत में खाने वाली सभी चीजों का सेवन भी कर सकती है। कुछ लोग शिवरात्रि का व्रत रात्रि में ही सदा भोजन करके खोल लेते है।
इस वर्ष आप भी भोले बाबा का व्रत करके उन्हें प्रसन्न करें और उनसे अच्छे जीवनसाथी का आशीर्वाद लें।माना जाता है, इस व्रत के प्रभाव से कुंवारी लड़कियों को मनचाहा वर प्राप्त होता है और जिन महिलाओं का विवाह हो चुका है उनके पति का जीवन और स्वास्थ्य हमेशा अच्छा रहता है।
यह रहेगा महाशिवरात्रि 2018 का शुभ मुहूर्त—
वर्ष 2018 में महाशिवरात्रि का पर्व 13 फरवरी 2018, मंगलवार के दिन मनाई जाएगा।
इस दिन शिवरात्रि निशिता काल पूजा का समय 24:09 से 25:01 तक रहेगा। मुहूर्त की अवधि कुल 51 मिनट की है।
14 तारीख को महाशिवरात्रि पारण का समय 07:04 से 15:20 तक रहेगा।
रात्रि पहले प्रहर पूजा का टाइम = 18:05 से 21:20 तक
रात के दूसरा प्रहर में पूजा का टाइम = 21:20 से 24:35 तक
रात्रि तीसरा प्रहर पूजा का टाइम = 24:35+ से 27:49 तक
रात्रि चौथा प्रहर पूजा का टाइम = 27:49+ से 31:04 तक
चतुर्दशी तिथि 13 फरवरी 2018, मंगवलार 22:34 से प्रारंभ होगी जो 15 फरवरी 2018, 00:46 बजे खत्म होगी।
इस वर्ष महाशिवरात्रि के शुभ दिन/अवसर पर (अतिरिक्त इस दिन मनाए जाएंगे) ये त्यौहार भी देश भर में मनाएं जायेंगे–
 ऋषि बोध उत्सव, स्वामी दयानंद बोधोत्सव, श्री वैद्यनाथ जयंती, श्री संगमेश्वर महादेव अरुणाय (पिहोवा, हरियाणा) के शिव त्रयोदशी पर्व की तिथि,कालेश्वर महादेव देहरा गोपीपुर (हिमाचल), मेला श्री नीलकंठ महादेव (पौढ़ी, गढ़वाल, लक्ष्मण- झूला ऋषिकेश से), शिवरात्रि मेला सर्वत्र और आर्य समाज सप्ताह प्रारम्भ होगा।
2019 में महाशिवरात्रि की तिथि व समय—
महाशिवरात्रि दिन शुक्रवार 4 मार्च 2019 को पड़ेगी।
निशिथ काल पूजा- 24:07 से 24:57
पारण का समय- 06:46 से 15:26 (5 मार्च)
चतुर्दशी तिथि आरंभ- 16:28 (4 मार्च)
चतुर्दशी तिथि समाप्त- 19:07 (5 मार्च)
महिलाओं के लिए शिवरात्रि का विशेष महत्व है। अविवाहित महिलाएं भगवान शिव से प्रार्थना करती हैं कि उन्हें उनके जैसा ही पति मिले। वहीं विवाहित महिलाएं अपने पति और परिवार के लिए मंगल कामना करती हैं।
भगवान शिव को कल्याणकारी माना जाता है। माना जाता है कि भगवान शिव अपने भक्तों पर आने वाले कष्टों हरण कर लेतें। जब-जब देवताओं, ऋषि-मुनियों या फिर ब्रह्मांड में कहीं भी जीवन पर संकट आया है तमाम कष्टों के विष को भगवान शिव ने धारण किया है। भगवान शिव की आराधना बहुत ही सरल एवं बहुत ही फलदायी मानी गयी है। सोमवार को भगवान शिव की पूजा का दिन माना जाता है। यहां आपको बता रहे हैं भगवान शिव के कुछ लोकप्रिय मंत्र जिनसे आप भगवान शिव की आराधना कर उन्हें प्रसन्न कर सकते हैं और उनकी कृपा पा सकते हैं।
शिव मूल मंत्र—
ॐ नमः शिवाय॥
यह भगवान शिव का मूल मंत्र हैं। मंत्रों में सबसे लोकप्रिय मंत्र भी है जिसे हिंदू धर्म में आस्था रखने वाला हर शिव उपासक जपता है। इस मंत्र की खास बात यह है कि यह बहुत ही सरल मंत्र है जिसके द्वारा कोई भी भगवान शिव की उपासना कर सकता है। इस मंत्र में भगवान शिव को नमन करते हुए उनसे स्वयं के साथ-साथ जगत के कल्याण की कामना की जाती है।
महामृत्युंजय मंत्र–
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम उर्वारुकमिव बन्धनानत् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
यह माना जाता है कि इस महामृत्युंजय मंत्र के जाप से भगवान शिव को प्रसन्न कर उनकी असीम कृपा तो प्राप्त होती ही है साथ ही यदि साधक इस मंत्र का सवा लाख बार निरंतर जप कर ले तो वर्तमान अथवा भविष्य की समस्त शारीरिक व्याधियां एवं अनिष्टकारी ग्रहों के दुष्प्रभाव समाप्त किये जा सकते हैं। यह भी माना जाता है कि इस मंत्र की साधना से अटल मृत्यु को भी टाला जा सकता है। इस मंत्र का उल्लेख ऋग्वेद में हुआ है। मंत्र में कहा गया है कि जो त्रिनेत्र हैं एवं हर सांस में जो प्राण शक्ति का संचार करने वाले हैं जिसकी शक्ति समस्त जगत का पालन-पोषण कर रही है हम उन भगवान शंकर की पूजा करते हैं। उनसे प्रार्थना करते हैं कि हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्ति दें ताकि मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त हो। जिस प्रकार ककड़ी पक जाने पर बेल के बंधन से मुक्त हो जाती है उसी प्रकार हमें भी ककड़ी की तरह इस बेल रुपी संसार से सदा के लिए मुक्त मिले एवं आपके चरणामृत का पान करते हुए देहत्याग कर आप में ही लीन हो जांए।
इस महामृत्युंजय मंत्र के 33 अक्षर हैं। महर्षि वशिष्ठ के अनुसार ये 33 अक्षर 33 देवताओं के प्रतीक हैं जिनमें 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्यठ, 1 प्रजापति एवं 1 षटकार हैं। इसलिए माना जाता है कि इस मंत्र सभी देवताओं की संपूर्ण शक्तियां विद्यमान होती हैं जिससे इसका पाठ करने वाले को दीर्घायु के साथ-साथ निरोगी एवं समृद्ध जीवन प्राप्त होता है।
कुछ साधक इस महामृत्युंजय मंत्र में संपुट लगाकर भी इसका उच्चारण करते हैं जो निम्न है:–
ॐ हौं जूं स: ॐ भूर्भुवः स्वःॐ त्र्यम्बकम् यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम्।उर्वारुकमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।। ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ।।
रुद्र गायत्री मंत्र–ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
भगवान रुद्र अर्थात शिव साक्षात महाकाल हैं। सृष्टि के अंत का कार्य इन्हीं के हाथों है। उन्हें सृष्टि का संहारकर्ता माना जाता है। सभी देवताओं सहित तमाम दानव, मानव, किन्नर सब भगवान शिव की आराधना करते हैं। लेकिन मानसिक रुप से विचलित रहने वालों को मन की शांति के लिए रुद्र गायत्री मंत्र से भगवान शिव की आराधना करनी चाहिए। जिन जातकों की जन्म पत्रिका अर्थात कुंडली में कालसर्प, पितृदोष एवं राहु-केतु अथवा शनि का कोप है इस मंत्र के नियमित जाप एवं नित्य शिव की आराधना से सारे दोष दूर हो जाते हैं। इस मंत्र का कोई विशेष विधि-विधान भी नहीं है। इस मंत्र को किसी भी सोमवार से प्रारंभ किया जा सकता हैं। अगर उपासक सोमवार का व्रत करें तो श्रेष्ठ परिणाम प्राप्त हो सकते हैं। ध्यान रहे कोई भी आराधना तभी फलदायी होती है जब वो सच्चे मन से की जाती है।
आइये समझें भगवान शिव स्वरूप के अर्थ (मायने)—
जटाएं – भगवान शिव की जटाओं में चंद्रमा से लेकर गंगा तक समायी हुई लगती हैं। इन्हें जटाधारी भी कहा जाता है जिस तरह ब्रह्मांड में आकाश गंगाएं तारे चंद्रमा होते हैं उसी तरह शिव की जटाओं से भी गंगा निकलती है। चंद्रमा उनकी शोभा को बढ़ाते हैं। अर्थात भगवान शिव की जटाएं अंतरिक्ष की ही प्रतीक हैं।
चंद्रमा – बाबा भोलेनाथ की जटाओं में ही मस्तक के ठीक ऊपर चंद्रमा दिखाई देता है। समुद्र मंथन के दौरान निकलने वाले रत्नों में एक चंद्रमा भी थे जिसे भगवान शिव ने धारण कर लिया। दरअसल चंद्रमा को ज्योतिष में मन का कारक माना जाता है। यह संकेत करता है कि भगवान शिव जिन्हें हम भोले बाबा भी कहते हैं इनका मन चंद्रमा की तरह उज्जवल  एवं जाग्रत है, चंचलता व भोलापन लिये है।
त्रिनेत्र – भगवान शिव के तीनों नेत्र उन्हें त्रिलोकी, त्रिगुणी और त्रिकालदर्शी बनाती हैं। तीन लोकों में स्वर्ग लोक, मृत्यु लोक या कहें भू लोक और पाताल लोक आते हैं तो सत्व, रज और तम तीन गुण माने जाते हैं। भूत, वर्तमान और भविष्य तीन काल हैं। त्रिनेत्र होने के कारण ही भगवान शिव त्रिलोचन कहे जाते हैं।
सांपों का हार – सांप या कहें सर्प तमोगुणी प्रवृतियों का प्रतीक है। भगवान शिव के गले में होने के कारण यह संदेश मिलता है कि तमोगुणी प्रवृतियां भगवान शिव के वश में हैं। उनके अधीन हैं।
मुंडमाला – उनके गले में एक मुंडमाला भी दिखाई देती है। पौराणिक कथाओं की माने तो ये सभी मुंड देवी शक्ति के हैं भगवान शिव के लिये उन्होंने 108 बार जन्म लिया, उनसे विवाह किया और हर बार अपने प्राण त्यागने पड़े हर जन्म के साथ उनकी माला में एक मुंड जुड़ता चला गया। दरअसल यह मृत्यु का ही प्रतीक हैं। शिव जो कि विध्वसंक की भूमिका निभाते हैं वे संदेश देते हैं कि मृत्यु को उन्होंने अनपे वश में कर रखा है।
त्रिशूल – शिव के साथ त्रिशूल भी दिखाई देता है मान्यता है कि यह तीन तरह के तापों का नाश करने वाला है। ये ताप दैविक, दैहिक और भौतिक तापों के लिये यह एक मारक शस्त्र है। अर्थात किसी भी प्रकार के कष्ट को भगवान शिव अपने त्रिशूल से नष्ट कर देते हैं।
डमरू – जब शिव का डमरू बजने लगे तो तांडव शुरु हो जाता है और तांडव से ही विध्वंस भी होने लगता है इसलिये शिव को नियंत्रित करने के लिये शक्ति यानि माता पार्वती भी उनके साथ नृत्य करती हैं जिससे शिव व शक्ति से संतुलन कायम होता है। भगवान शिव के डमरू का रहस्य यह है कि डमरू के नाद को ही ब्रह्मा का रूप माना जाता है। दरअसल जब विध्वंस होता है तभी ब्रह्मा निर्माण करते हैं। और विध्वंस तभी होता है जब शिव का डमरू बजता है और तांडव होने लगता है।
व्याघ्र खाल – भगवान शिव ने अपने तन को व्याघ्र की खाल से ढ़क रखा है। बाघ की खाल का ही आसन भी उन्होंने धारण कर रखा है। यहां बाघ हिंसात्मक और अंहकारी प्रवृति के प्रतीक हैं। शिव इन दोनों का दमन करते हैं और आवश्यकता नुसार ही इस्तेमाल करने का संकेत करते हैं। भगवान शिव ने बाघ की खाल से अपने उन्हीं अंगों को ढ़क रखा है जिन्हें ढ़कना आवश्यक होता है यानि शिव संदेश देते हैं स्वाभिमान जरूरी है लेकिन अंहकार का दमन करना चाहिये।
भस्म – भगवान शिव अपने तन पर भस्म भी रमाते हैं। इससे शिव यह संदेश देते हैं यह संसार नश्वर है सभी को एक दिन खाक में मिलना है। जब मिटेगा तभी सृजन होगा। यहां भस्म शिव के विध्वंस की प्रतीक भी हैं जिसके बाद ब्रह्मा जी पुनर्निमाण करते हैं।
वृषभ – भगवान शिव के वाहन नंदी माने जाते हैं नंदी वृषभ यानि बैल हैं। बैल गौवंश होता है, धार्मिक दृष्टि से भी बैल की काफी अहमियत मानी जाती है। पौराणिक ग्रंथों में तो बैल यानि वृषभ को धर्म का प्रतीक भी माना जाता है। धर्म रूपी इस वृषभ के चारों पैर चार पुरुषार्थों की ओर ईशारा करते हैं जो कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष हैं। अत: इनकी प्राप्ति शिव की कृपा से ही प्राप्त होती है। वृषभ चूंकि भगवान शिव के वाहन हैं इसलिये गौवंश की रक्षा करने का धार्मिक महत्व भी है।
कुल मिलाकर कहना यह है कि भगवान का आकार कैसा है यह कोई नहीं जानता क्योंकि जिसने उसके रूप का दिदार कर लिया उसमें इतना सामर्थ्य ही नहीं रहता कि वह उसके रूप का बखान कर सके इसलिये धार्मिक ग्रंथों में ऋषि मुनियों ने उस रूप के दर्शन हेतु प्रतीकात्मक उपाय अपनाये हैं। जिनमें से देवस्वरूपों की व्याख्या भी एक प्रतीकात्मक अर्थ लिये रहती है।
जानिए इस शिव रात्रि पर कैसे करें आपकी राशिनुसार शिव की पूजा—
मेष – मेष राशि के स्वामी मंगल हैं। इनके लिये लाल रंग शुभ माना जाता है। मान्यता है कि लाल चंदन व लाल रंग के पुष्प यदि सावन में मेष राशि के जातक भगवान भोलेनाथ को अर्पित करें तो यह बहुत ही पुण्य फलदायी रहता है। यदि पूजा के समय नागेश्वराय नम: मंत्र का जाप भी किया जाये तो भगवान शिवशंकर आपके मन की मुराद जल्द पूरी करते हैं।
वृषभ – वृषभ तो भगवान शिव के वाहन भी हैं। आपके राशि स्वामी शुक्र माने जाते हैं। सफेद रंग आपके लिये शुभ माना जाता है। वृषभ जातकों को भगवान शिव की पूजा चमेली के फूलों से करनी चाहिये। साथ ही अपने कष्टों के निवारण व अपेक्षित लाभ प्राप्ति के लिये शिव रुद्राष्टक का पाठ भी करना चाहिये।
मिथुन – मिथुन राशि के स्वामी बुध माने जाते हैं। मिथुन जातक भगवान शिव को धतूरा, भांग अर्पित कर सकते हैं। साथ ही पंचाक्षरी मंत्र ॐ नम: शिवाय का जाप करना भी आपके लिये लाभकारी रहेगा।
कर्क – कर्क राशि के स्वामी चंद्रमा हैं जिन्हें भगवान शिव ने अपनी जटाओं में धारण कर रखा है। कर्क जातकों को शिवलिंग का अभिषेक भांग मिश्रित दूध से करना चाहिये। रूद्रष्टाध्यायी का पाठ आपके कष्टों का हरण करने वाला रह सकता है।
सिंह – सिंह राशि के स्वामी सूर्य हैं। भगवान शिव की आराधना में सिंह जातकों को कनेर के लाल रंग के पुष्प चढ़ाने चाहिये। इसके साथ ही शिवालय में भगवान श्री शिव चालीसा का पाठ भी करना चाहिये। यह आपके लिये अति लाभकारी सिद्ध हो सकती है।
कन्या – कन्या के स्वामी बुध माने जाते हैं। कन्या जातकों को भगवान शिवजी की पूजा में बेलपत्र, धतूरा, भांग आदि सामग्री शिवलिंग पर अर्पित करनी चाहिये। इसके साथ ही पंचाक्षरी मंत्र का जाप आपकी मनोकामनाओं को पूरी कर सकता है।
तुला – तुला राशि के स्वामी शुक्र माने जाते हैं। आपको मिश्री युक्त दूध से शिवलिंग का अभिषेक करना चाहिये। साथ ही शिव के सहस्रनामों का जाप करना भी आपकी राशि के अनुसार शुभ फलदायी माना जाता है।
वृश्चिक – वृश्चिक राशि के स्वामी भौमेय मंगल माने जाते हैं। भोले भंडारी की पूजा आपको गुलाब के फूलों व बिल्वपत्र की जड़ से करनी चाहिये। प्रतिदिन रूद्राष्टक का पाठ करने से आपकी राशि के अनुसार सौभाग्यशाली परिणाम मिलने लगते हैं।
धनु – बृहस्पति को धनु राशि का स्वामी माना जाता है। इन्हें पीला रंग प्रिय होता है। यदि धनु राशि वाले जातकों को सावन माह में प्रात:काल उठकर भगवान शिव की पूजा पीले रंग के फूलों से करनी चाहिये। प्रसाद के रूप में खीर का भोग लगाना चाहिये। आपके लिये शिवाष्टक का पाठ कष्टों का नाश करने वाला माना जाता है।
मकर – मकर शनि की राशि मानी जाती है। धतूरा, भांग, अष्टगंध आदि से भगवान शिव की पूजा आपके लिये जीवन में शांति और समृद्धि लाने वाली रहती है। इसके साथ ही आपको पार्वतीनाथाय नम: का जाप भी करना चाहिये।
कुंभ – कुंभ राशि के स्वामी भी शनि ही माने जाते हैं। कुंभ जातकों को गन्ने के रस से शिवलिंग का अभिषेक करना चाहिये। साथ ही धन लाभ पाने के लिये शिवाष्टक का पाठ आपको करना चाहिये। जल्द ही अच्छे परिणाम मिल सकते हैं।
मीन – मीन राशि के स्वामी बृहस्पति माने जाते हैं। मीन जातकों को पंचामृत, दही, दूध एवं पीले रंग के फूल शिवलिंग पर अर्पित करने चाहिये। घर में सुख समृद्धि व धनधान्य में वृद्धि के लिये पंचाक्षरी मंत्र नम: शिवाय का चंदन की माला से 108 बार जाप करना चाहिये।
भगवान शिव देवों के देव महादेव कहे जाते हैं। राशिनुसार उनकी आराधना कर आप अपनी कुंडली में मौजूद ग्रहों के नकारात्मक प्रभावों को कम कर सकते हैं। शिवभक्तों पर भगवान भोलेनाथ अपनी कृपा बनाये रखें।

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