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क्या सोमनाथ में गैर हिंदू अंकन-पटकथा मंचन था – राज सक्सेना

विगत नवम्बर के अंतिम बुधवार को राहुल गांधी की गुजरात यात्रा में सोमनाथ मन्दिर में दर्शन अचानक विवादित हो गया जब उनके मीडिया प्रभारी मनोज त्यागी ने बाकायदा अपने पद सहित हस्ताक्षरों के साथ सोमनाथ मन्दिर में रखे गये गैर हिन्दू दर्शनार्थियों के लिए रखे गये रजिस्टर में अहमद पटेल के नाम से  पहले राहुल गांधी के नाम की एंट्री कर दी और स्वयं इंट्री कर गायब हो गये। स्वाभाविक है जो बवाल कांग्रेस मचाना चाहती थी, मचा और इस कदर मचा कि देर रात और अगले दिन भी मीडिया की सुर्खी बना रहा।

एंट्री के आधे घंटे के ही अंदर अहमदाबाद में कांग्रेस प्रवक्ता सुरजेवाला ने प्रेस कांफ्रेंस बुला कर इसे बीजेपी का षड़îंत्रा, फोटोशाप और न जाने क्या क्या बता दिया और मजे की बात यह कि साथ ही उन्होंने राहुल गांधी को जिन्हें वे पहले से ही शिवभक्त सिद्ध करते चले आ रहे थे, इस बार जनेऊ धारी हिन्दू भी सिद्ध करने का पूर्ण प्रयास किया और उनके शब्दों में गूगल से ली गयीं दो तीन फोटो भी प्रेस के सामने प्रस्तुत की गयीं जिसमें अपने पिता के अस्थिविसर्जन के समय और अपनी बहन प्रियंका गांधी के विवाह के समय राहुल गांधी को अपने वस्त्रों के ऊपर एक तागा लपेटे हुए दिखाया गया था और उसे वे जनेऊ बता रहे थे तथा इस आधार पर राहुल को जनेऊधारी हिन्दू (उच्च कुलीन हिन्दू) सिद्ध करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाते रहे। इसके बाद अचानक कांग्रेस के नेताओं की फौज राहुल को सच्चा और सवर्ण हिन्दू सिद्ध करने के लिए दिन भर और फिर अगले दिन भी लगी रही।

आखिर कांग्रेस को राहुल को हिन्दू सिद्ध करने की इतनी जरूरत क्यों पड़ी? इसका उत्तर गुजरात के चुनाव में राहुल का प्रसिद्ध मन्दिरों में माथा टेकने पर जनसामान्य द्वारा उठाए गये सवाल जिन्हें कांग्रेस बीजेपी द्वारा उठाए गये सवाल कहती रही है, हो सकता है। सही बात तो यह है कि अब तक कभी किसी प्रदेश यहाँ तक कि दिल्ली में भी कभी किसी मन्दिर में मत्था टेकने नहीं गये उन राहुल को जो मन्दिर में लोगों के जाने को लड़कियाँ छेड़ने से जोड़ते रहे हैं अचानक मन्दिर जाने और अपनी शिव भक्ति, धर्म प्रेम को जनता के सामने टीवी कैमरों की मदद से लाने की क्या जरूरत पड़ गयी जो वे गुजरात में इतनी शिद्दत से अपनी भक्ति और हिंदुत्व का प्रदर्शन कर रहे हैं। इसका सीधा सा उत्तर है दृ मोदी और उनके कार्य कलाप।

गुजरात का निर्वाचन वस्तुतः कांग्रेस के लिए अस्तित्व की लड़ाई है। अगर इस इलेक्शन में कांग्रेस हारती है तो निश्चित रूप से इतिहास के अंधेरों में कई वर्षों के लिए चली जाएगी। इसलिए वह गुजरात में वह हर जायज-नाजायज हथकंडा अपना रही है जिससे उसे थोड़े से भी वोटों के बढ़ोत्तरी की उम्मीद हो। इसके लिए उसके निर्वाचन सलाहकार जो भी पटकथा का प्रारूप उसके सामने रखते हैं वह उसी का मंचन करना प्रारम्भ कर देती है। इस प्रकरण में भी मूल में यही है। जब कांग्रेस के सलाहकारों को लगा कि राहुल का मन्दिर-मन्दिर जाना उपहास का कारण इसलिए बनता जा रहा है कि अधिकाँश लोग उन्हें हिन्दू मानते ही नहीं और इससे पूर्व राहुल ने स्वयं को कभी हिन्दू कहा भी नहीं है, न ही उन्होंने अपने किसी क्रिया-कलाप से स्वयं के हिन्दू होने का आभास ही दिया था तो बिना इसकी प्रतिक्रिया का संज्ञान लिए, शायद सोमनाथ की पटकथा लिखी गयी और उनके मीडिया प्रभारी ने या तो फोटोशाप से या फिर सही में ही एक तागा लपेटे राहुल के फोटो प्रवक्ताओं को वितरित किये और गैर हिन्दुओं के लिए निर्धारित रजिस्टर में राहुल के नाम की इंट्री करके इस मामले को तूल पकड़वा दिया। तूल पकड़ते ही सुरजेवाला वे सारी फोटो लेकर हाजिर हो गये जो वे प्रेस को देना चाहते थे। हालांकि बीजेपी लाख चीखती रही कि हमें इससे क्या कि राहुल हिन्दू हैं या नहीं ?

आइये इस विषय पर थोड़ी चर्चा जब कांग्रेसी मित्रों ने शुरू कर ही दी है तो हम भी कर लें। राहुल के नाना जवाहरलाल नेहरु का मुस्लिम प्रेम जगजाहिर है। कश्मीर की समस्या को अपने हाथ में लेकर उन्होंने उसे कहां का कहां पहुंचाया, यह भी छिपा हुआ नहीं है। आज तक गले की हड्डी है। वे स्वयं मंचों से कई बार कहते थे कि वे विचारों से यूरोपियन और संस्कृति से मुस्लिम हैं। हिन्दू तो वे एक्सीडेंटल बर्थ (अपने जन्म के लिए वे यही शब्द प्रयोग करते थे ) से हैं। उनके द्वारा प्रयोगित एक्सीडेंटल का अर्थ दुर्घटनावश होता है। अब आप अंदाजा लगा लें कि वे कितने धर्मनिष्ठ हिन्दू थे। उन्होंने कई बार यह भी कहा कि वे अनीश्वरवादी व्यक्ति हैं। अपने वामपंथी झुकाव को भी उन्होंने कभी नहीं छुपाया।

अब आते हैं राहुल गांधी के दादा श्री की ओर। कहा जाता है कि (हालांकि यह विवादित है कि वे पारसी थे या मुस्लिम) राहुल के दादा फिरोज गांधी एक पारसी परिवार से थे और उन्होंने इंदिरा जी से विवाह करने के लिए अपना धर्म भी नहीं बदला था। स्वयं राजीव गांधी अपना आफिशियल नाम राजीव फिरोज गांधी और संजय गांधी अपना नाम संजय फिरोज गांधी लिखते थे। यह बात भी सही है कि इंदिरा जी और फिरोज गाँधी की शादी पहले इंग्लैण्ड में अन्य धर्म पद्धति के अनुसार हुई थी और यह दबे शब्दों में कहा जाता है कि जनता में आक्रोश न फैले और परिवार की छवि सुरक्षित रहे, इसलिये गांधी जी की इच्छानुसार हिन्दू रीतिरिवाजों से भी इन दोनों का विवाह कराया गया था। स्मरणीय है कि फिरोज ने अपना धर्म परिवर्तन (अगर उन्हें पारसी माना जाय तो उनकी कब्र ममफोर्डगंज में क्यों है। उनका अंतिम संस्कार पारसी पद्धति से क्यों नहीं हुआ) नहीं किया था। भारतीय परम्पराओं के अनुसार इंदिरा गांधी जो अपने पति और राजीव गांधी जो अपने पिता का टाइटल लगाते रहे पिता के ही धर्म के माने जाएंगे, जब तक कि वे पुनः हिन्दू धर्म न स्वीकार कर लें किन्तु इसका कोई प्रमाण नहीं है कि राजीव ने कभी हिन्दू धर्म में वापसी की। इस प्रकार तो पिता की ओर से राहुल को भी पारसी या जो कुछ भी वे थे, माना जाना चाहिए।

आइये अब आते हैं राहुल की माता श्री की ओर। जहां तक सोनिया गांधी का प्रश्न है वे राजीव से विवाह से पूर्व कैथोलिक ईसाई थीं और विवाह से पूर्व अथवा बाद में भी कभी यह सामने नहीं आया कि उन्होंने हिन्दू धर्म स्वीकार किया है। उनका विवाह भी विदेश में हुई सिविल मैरिज ही बताया जाता है जो बाद में हिन्दू पद्धति से भी हुआ। इस प्रकार राहुल गांधी पिता की ओर से पिता-दादा के धर्म के और माँ की ओर से कैथोलिक ईसाई प्रथम दृष्टया नजर आते हैं ? इस सम्बन्ध में यह भी उल्लेखनीय है कि सुब्रमण्यम स्वामी के कथनानुसार कोलम्बस स्कूल में एडमिशन के समय फार्म में राहुल का धर्म क्रिश्चियन लिखाया गया।

सुब्रमण्यमस्वामी तो यह भी कहते हैं कि सोनिया-राहुल के आधिकारिक निवास 10 जनपथ के पीछे एक चर्च है जिसमें हर रविवार को राहुल भी जाते हैं। यहाँ यह भी स्मरणीय है कि राहुल गांधी ने कभी स्वयं को यहाँ तक कि कभी भी अपने को सार्वजनिक रूप से हिन्दू घोषित नहीं किया है। केवल कांग्रेस के प्रवक्ता उनके हिन्दू होने की बात करते हैं, जहां तक राहुल की बहन का प्रश्न है। उनके पति भी क्रिश्चियन बताए जाते हैं और यह भी चर्चा है कि वे नियमित रूप से प्रियंका वाड्रा और बच्चों के साथ चर्च जाते हैं।

अब तक घटे घटनाक्रम से यह स्पष्ट लगता है कि दिल्ली में बैठ कर एक पटकथा लिखी गयी और सोमनाथ दर्शन के समय उसका मंचन कांग्रेस की सोच के अनुसार निर्धारित समय पर कर विवाद को हवा देकर मनोज त्यागी अंतर्ध्यान हो गये। राहुल गांधी का इस विषय में कुछ न बोलना क्या उनकी मौन सहमति नहीं सिद्ध करता। इसे अगर इस पहलू से देखें कि वर्तमान में राहुल कांग्रेस के सबसे शक्तिशाली नेता हैं क्या उनकी सहमति के बिना उनका मीडिया प्रभारी इस तरह की हरकत कर सकता था ?

बेझिझक इसका एक ही जबाव है नहीं। अपने आप को निर्वाचन प्रपत्रों में हिन्दू लिखने वाले राहुल को अब स्वयं एक प्रेस कांफ्रेंस करके गलती को दुरुस्त करने का मामूली काम करने पूरे चालीस घंटे क्यों लगे? इसे करने में आखिर उन्हें झिझक क्यों हो रही थी। शायद कांग्रेसी नीति नियंताओं ने यह भी सोचा होगा कि मामला या तो उठेगा ही नहीं या फिर उठा भी तो इसे एक प्रभारी की धोखे से की गयी छोटी गलती मान लिया जाएगा। बात आई गयी हो जाएगी और वक्त जरूरत पर किसी अन्य क्षेत्रा में इस घोषणा को राहुल की धर्मनिरपेक्ष छवि के साथ रख कर उन्हें सेकुलर घोषित कर दिया जाएगा किन्तु मीडिया ने अपने चरित्रा और चाल के अनुसार प्रकरण को पकड़ लिया और कांग्रेस की यह चाल जो दीर्घगामी हितों को रख कर चली गयी थी, उलटे कांग्रेस के गले ही पड़ गयी। जैसा कि होता है कुछ दिनों में कोई और मुद्दा उठेगा और यह प्रकरण किनारे हो जाएगा। मनोज त्यागी मामले के ठंडा होने तक अंतर्ध्यान रहेंगे और राहुल के प्रवक्ता उन्हें प्रखर हिन्दू सिद्ध करते रहेंगे।

अगर यह विवेचन सही नहीं है तो तुरंत इस गलती का खंडन क्यों नहीं आया। क्यों नहीं कहा गया कि यह सिर्फ एक मानवीय भूल थी और इसे जानबूझ कर नहीं किया गया था। मामले को तूल क्यों पकड़ने दिया गया। और सबसे बड़ी बात इतनी भयंकर भूल करने वाले मनोज त्यागी को अभी तक कांग्रेस से निकाला क्यों नहीं गया?

इन सब का एक ही जबाव हो सकता है और वह यह कि यह सब पूर्व निर्धारित था जिसकी पटकथा दिल्ली में लिखी गयी थी और जिसका मंचन गुजरात के चुनावों के परिप्रेक्ष्य में, जिस सोमनाथ मन्दिर के पुनरोद्धार के राहुल के नाना जवाहरलाल नेहरु घोर विरोधी थे और जिसके लोकार्पण समारोह में भाग न लेने के लिए जिन्होंने अपने हस्ताक्षरों से देश के समस्त मुख्य मंत्रियों को औपचारिक पत्रा भेजा था कि वे समारोह में भाग न लें,  उसी सोमनाथ के पवित्रा मन्दिर में चुनाव में लाभ लेने के लिए किया गया। (युवराज)

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